उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पुलिस कमिश्नरी व्यवस्था लागू होने के बावजूद अपराध और अतिक्रमण की समस्याएं आम नागरिकों के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। पुराने लखनऊ में लगातार हो रही आपराधिक घटनाओं, दिनदहाड़े हत्याओं और चाकूबाजी की वारदातों ने पुलिस की कार्यप्रणाली और कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि भारी-भरकम पुलिस बल, आधुनिक संसाधनों और सर्विलांस व्यवस्था के बावजूद राजधानी के नागरिक खुद को सुरक्षित क्यों महसूस नहीं कर पा रहे हैं?

पुराने लखनऊ के सहादतगंज थाना क्षेत्र के नौबस्ता-ब्राह्मणी टोला में हुए तिहरे हत्याकांड के बाद इसी थाना क्षेत्र में एक और युवक की सरेआम चाकुओं से हमला कर हत्या किए जाने की घटना ने पुलिस की सक्रियता को लेकर बहस तेज कर दी है। पुराने लखनऊ की कुछ पुलिस चौकियों और थानों को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं। चर्चा है कि कुछ स्थानों पर यूट्यूबर और कथित प्रभावशाली बाहरी लोग पुलिस के कामकाज में हस्तक्षेप करते हैं। एक पुलिस चौकी पर चौकी इंचार्ज की कुर्सी पर गैर पुलिसकर्मी के बैठे मिलने का दावा भी किया गया है। बताया जाता है कि एक पत्रकार ने इसका वीडियो बनाया था, हालांकि वह सार्वजनिक नहीं हुआ।

कुछ थानों में फरियादियों की समस्याओं के समाधान में पुलिसकर्मियों से अधिक कथित गणमान्य लोगों की भूमिका होने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। एक थाने के बाहर फरियादियों के बैठने के स्थान पर यूट्यूबरों के माइक और मोबाइल कैमरों के साथ मौजूद रहने की बात भी चर्चा में है। यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो पुलिस प्रशासन के लिए इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। राजधानी की प्रमुख सड़कों और बाजारों में पुलिस की नियमित मौजूदगी कम दिखाई देने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। गलियों और घनी आबादी वाले इलाकों में पुलिस गश्त की स्थिति को लेकर भी सवाल उठते हैं। वहीं, सड़कों पर ठेले-खोमचे लगने से यातायात प्रभावित होता है और कई स्थानों पर आधी सड़क तक अतिक्रमण की चपेट में रहती है। स्थानीय स्तर पर यह मांग उठ रही है कि पुलिस अधिकारी केवल कार्यालयों तक सीमित न रहें, बल्कि नियमित रुप से क्षेत्र में निकलकर बाजारों, संवेदनशील इलाकों और भीड़भाड़ वाले स्थानों का निरीक्षण करें।

इसी बीच प्रदेश के पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण और अपर पुलिस महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) अमिताभ यश ने ऑनलाइन बैठक में पुलिस अधिकारियों को महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। धनतेरस से छठ पर्व तक बाजारों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में शाम के समय वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और थाना प्रभारियों को स्वयं गश्त करने को कहा गया है। निर्देशों के मुताबिक यूपी-112 की गाड़ियां भी शाम छह बजे से सात बजे के बाद सायरन बजाते हुए धीमी गति से संवेदनशील और भीड़भाड़ वाले इलाकों में गश्त करेंगी, ताकि पुलिस की मौजूदगी का एहसास आम नागरिकों को हो सके।कमिश्नरी व्यवस्था लागू होने से पहले भी लखनऊ में कई बार एसएसपी स्तर से ऐसे निर्देश जारी किए जाते रहे हैं। उस दौरान थाना प्रभारी पुलिस बल के साथ प्रमुख बाजारों और संवेदनशील इलाकों में पैदल गश्त करते थे। इससे अपराध नियंत्रण के साथ अतिक्रमण पर भी अंकुश लगाने में मदद मिलती थी। अब सवाल उठ रहा है कि आधुनिक पुलिसिंग, सर्विलांस और तकनीकी संसाधनों के बीच परंपरागत पुलिसिंग यानी मुखबिर तंत्र, पैदल गश्त और जनता से सीधा संवाद कहीं पीछे तो नहीं छूट गया है?

नौबस्ता तिहरे हत्याकांड के आरोपी से जुड़े लोगों की गिरफ्तारी में हुई देरी और चर्चित शिवा प्रकरण में आरोपियों की नागपुर से गिरफ्तारी के लिए एसटीएफ की भूमिका ने भी स्थानीय पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं। इन मामलों में गिरफ्तारी के लिए विशेष एजेंसियों की मदद लिए जाने के बाद यह चर्चा तेज हुई है कि स्थानीय पुलिस की सूचना प्रणाली और अपराधियों पर निगरानी का तंत्र कितना प्रभावी है।राजधानी में पुलिस कमिश्नरी व्यवस्था का उद्देश्य कानून-व्यवस्था को मजबूत करना, अपराध पर त्वरित नियंत्रण और आम नागरिकों को सुरक्षित माहौल देना है। ऐसे में केवल बड़े कार्यालयों, आधुनिक वाहनों और तकनीकी संसाधनों से पुलिसिंग की सफलता तय नहीं हो सकती। जरूरत इस बात की है कि वरिष्ठ अधिकारी नियमित रुप से सड़कों पर उतरें, थाना प्रभारी अपने क्षेत्रों में सक्रिय रहें, पुलिस चौकियों में बाहरी हस्तक्षेप के आरोपों की जांच हो और बाजारों से अतिक्रमण हटाने के लिए प्रभावी अभियान चलाया जाए। आखिर राजधानी का आम नागरिक यह जानना चाहता है कि जब पुलिस की इतनी बड़ी व्यवस्था मौजूद है तो उसे सुरक्षा का भरोसा कब और कैसे मिलेगा?
