वकीलों की मांग पर दो पुलिस अधिकारियों के तबादले से भड़के पुलिसकर्मी, पुलिस मुख्यालय के बाहर किया प्रदर्शन

तीन महीने से प्रदर्शनकारियों को रोकने वाली पुलिस खुद धरने पर बैठी, ACP और इंस्पेक्टर के तबादले के विरोध में उठाई आवाज

Akhlaque Khan
Akhlaque Khan Published on : November 2, 2026 6:44 am
वकीलों की मांग पर दो पुलिस अधिकारियों के तबादले से भड़के पुलिसकर्मी, पुलिस मुख्यालय के बाहर किया प्रदर्शन
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राजधानी दिल्ली में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया, जिसने पुलिस और प्रदर्शन के बीच के रिश्ते को चर्चा में ला दिया है। पिछले करीब तीन महीने से विभिन्न प्रदर्शनों को नियंत्रित करने और प्रदर्शनकारियों को धरने से रोकने वाली दिल्ली पुलिस के कुछ जवान और कर्मचारी खुद विरोध प्रदर्शन की राह पर उतर आए। मामला वकीलों की मांग पर एक एसीपी और एक इंस्पेक्टर के तबादले से जुड़ा है। अधिकारियों के स्थानांतरण के विरोध में पुलिसकर्मियों ने प्रदर्शन कर अपनी नाराजगी जाहिर की।

वकीलों की हड़ताल खत्म कराने के लिए हुआ था तबादला, अब पुलिसकर्मी ही अपने अधिकारियों के समर्थन में उतरे। पुलिस मुख्यालय के बाहर करीब 100 पुलिसकर्मियों के प्रदर्शन में महिला पुलिसकर्मी भी शामिल रहीं। पुलिस कमिश्नर से मुलाकात और दोनों अधिकारियों की पुरानी तैनाती बहाल करने की मांग उठाई। दरअसल, पूरा विवाद पूर्वी दिल्ली के शाहदरा थाने में 23 अक्टूबर को हुई एक घटना से जुड़ा है। जानकारी के मुताबिक, थाने में हुए विवाद और हाथापाई के दौरान अधिवक्ता ललित बंसल के सिर में गंभीर चोट लग गई थी। इसके बाद वकीलों ने पुलिस पर दुर्व्यवहार और उचित कार्रवाई नहीं करने के आरोप लगाए।

वकीलों का आरोप था कि घटना के बाद जब वे पुलिस अधिकारियों से कार्रवाई की मांग करने पहुंचे तो उनके साथ भी अभद्रता की गई। इसी दौरान एसीपी मनस्वी वशिष्ठ पर अपना रिवॉल्वर दिखाकर अधिवक्ताओं को धमकाने का आरोप भी लगाया गया। इस मामले को लेकर दिल्ली की जिला अदालतों के वकीलों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरु कर दी थी। वकीलों के बढ़ते विरोध और हड़ताल को समाप्त कराने के लिए पुलिस प्रशासन ने 28 अक्टूबर को एसीपी मनस्वी वशिष्ठ और शाहदरा थाने के तत्कालीन एसएचओ अरुण कुमार का तबादला कर दिया। एसीपी मनस्वी वशिष्ठ को गांधी नगर सब-डिवीजन से स्पेशल पुलिस यूनिट फॉर वुमेन एंड चिल्ड्रन भेज दिया गया, जबकि इंस्पेक्टर अरुण कुमार को सिक्योरिटी यूनिट में स्थानांतरित कर दिया गया। इसके बाद वकीलों ने अपनी हड़ताल समाप्त कर दी।

इस फैसले से पुलिस विभाग के एक वर्ग में नाराजगी फैल गई। पुलिसकर्मियों का मानना था कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच किए बिना अधिकारियों के खिलाफ तबादले जैसी कार्रवाई करना उचित नहीं है। दोनों अधिकारियों के समर्थन में पुलिसकर्मियों ने सोमवार को दिल्ली पुलिस मुख्यालय पहुंचकर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार उनसे सीधे बातचीत करें और दोनों अधिकारियों के तबादले पर पुनर्विचार किया जाए। प्रदर्शन में शामिल पुलिसकर्मियों ने पुलिस एकता के नारे लगाए। उनका कहना था कि यदि पुलिसकर्मी अपने कार्यस्थल पर ही सुरक्षित और सम्मानित महसूस नहीं करेंगे तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने में कठिनाइयां आएंगी।

तबादला किए गए एसीपी मनस्वी वशिष्ठ भी प्रदर्शन में शामिल हुए। उन्होंने इसे पुलिसकर्मियों की स्वतःस्फूर्त एकजुटता बताते हुए कहा कि वे अपनी बात वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचाना चाहते हैं। उन्होंने पुलिस कमिश्नर से संवाद के लिए एक विशेष बैठक आयोजित करने की मांग भी की। पुलिस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन कर रहे पुलिसकर्मियों को समझाने के लिए नई दिल्ली के डीसीपी सचिन शर्मा मौके पर पहुंचे। उन्होंने प्रदर्शनकारियों से कहा कि वे मुख्यालय के अंदर चलकर वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बातचीत करें। उन्होंने भरोसा दिलाया कि उनकी शिकायतें सुनी जाएंगी और बातचीत के जरिए समाधान निकाला जाएगा। डीसीपी ने पुलिसकर्मियों को अनुशासित बल का सदस्य होने की याद दिलाते हुए प्रदर्शन समाप्त करने की अपील की। हालांकि, पुलिसकर्मी पुलिस कमिश्नर के साथ सीधे संवाद और अपनी मांगों पर स्पष्ट जवाब चाहते थे। इस दौरान मुख्यालय के बाहर तैनात पुलिसकर्मियों और प्रदर्शनकारियों के बीच असहज स्थिति भी बनी रही।

इस घटनाक्रम का दूसरा पहलू भी चर्चा में रहा। प्रदर्शन और धरने की कवरेज के दौरान अक्सर पुलिस और पत्रकारों के बीच तनाव की स्थिति देखने को मिलती है। पत्रकारों को कई बार विरोध-प्रदर्शनों की कवरेज करने से रोकने के आरोप भी लगते रहे हैं। लेकिन सोमवार को तस्वीर कुछ अलग थी। पुलिसकर्मियों के अपने विभाग के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों ने मौके पर पहुंचकर उनकी बातों को प्रमुखता से सामने रखा।दिल्ली पुलिस के इस घटनाक्रम ने विभागीय अनुशासन, पुलिसकर्मियों के सम्मान और प्रशासनिक फैसलों की निष्पक्षता को लेकर बहस छेड़ दी है। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि किसी विवाद में पुलिसकर्मियों के खिलाफ शिकायत आती है तो क्या बिना पूरी जांच के तबादला ही समाधान होना चाहिए? वहीं, वकीलों की शिकायतों और अधिवक्ता के घायल होने की घटना की निष्पक्ष जांच भी उतनी ही जरुरी है।

गौरतलब है कि वर्ष 2019 में तीस हजारी कोर्ट परिसर में वकीलों और पुलिसकर्मियों के बीच टकराव के बाद भी दिल्ली पुलिस के जवानों ने बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया था। ऐसे में छह साल बाद एक बार फिर पुलिस और वकीलों के बीच विवाद ने पुलिस महकमे को सार्वजनिक विरोध की स्थिति में ला खड़ा किया है।फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम ने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है कि जब पुलिस के जवान ही अपनी बात रखने के लिए धरने का रास्ता अपनाने लगें, तो विभाग के भीतर संवाद और शिकायतों के समाधान की व्यवस्था कितनी प्रभावी है?

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