हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: पुलिसकर्मियों पर FIR के आदेश को किया रद्द, प्रदेश के न्यायिक अधिकारियों को दिए निर्देश

Akhlaque Khan
Akhlaque Khan Published on : October 10, 2026 5:25 am
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: पुलिसकर्मियों पर FIR के आदेश को किया रद्द, प्रदेश के न्यायिक अधिकारियों को दिए निर्देश
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महराजगंज की विशेष एससी-एसटी अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक उपनिरीक्षक, एक कांस्टेबल और करीब 20 अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। न्यायमूर्ति संतोष राय ने दिए फैसले में संबंधित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किए जाने पर आपत्ति जताई और प्रदेश के न्यायिक अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए।

मामला महराजगंज जिले के घुघली थाना क्षेत्र का है। उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बसंतपुर गांव की शीला और अंजू ने आरोप लगाया था कि 6 और 7 जून की रात उपनिरीक्षक राकेश कुमार यादव, कांस्टेबल अमित कुमार तथा करीब 20 पुलिसकर्मी उनके घर में दाखिल हुए। शिकायतकर्ताओं ने महिला पुलिसकर्मियों की अनुपस्थिति, तलाशी वारंट नहीं होने और जातिसूचक टिप्पणियों सहित अन्य आरोप लगाए थे।शिकायतकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने 12 जून को पुलिस अधीक्षक से भी शिकायत की थी, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद मामला विशेष एससी-एसटी अदालत पहुंचा, जहां 11 अगस्त को पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया गया। इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत के आदेश में पुलिस की रिपोर्ट पर समुचित विचार नहीं किया गया और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) तथा 175(4) के तहत निर्धारित प्रक्रिया का उचित पालन नहीं हुआ।

अदालत ने आदेश को कारणों का पर्याप्त उल्लेख नहीं करने वाला यानी नॉन-स्पीकिंग ऑर्डर माना। फैसले में न्यायिक आदेश पारित करते समय आपराधिक कानून और निर्धारित प्रक्रिया की समझ तथा उसका पालन सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुसार, जब किसी लोक सेवक या पुलिसकर्मी पर उसके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से संबंधित आरोप लगाए जाते हैं, तो प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश देने से पहले कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा। इसमें संबंधित अधिकारी के वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट और आरोपित लोक सेवक का पक्ष देखने की प्रक्रिया भी शामिल है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक आदेश में इस बात पर विचार दर्ज होना चाहिए कि आरोपित कृत्य का संबंध संबंधित कर्मचारी के आधिकारिक कर्तव्य से है या नहीं।

इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि पुलिसकर्मियों या अन्य सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं हो सकती। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जहां कानून विशेष प्रक्रिया निर्धारित करता है, वहां उसका पालन करते हुए तथ्यों और उपलब्ध सामग्री पर विचार करके ही आदेश पारित किया जाए। घटनाक्रम को न्यायिक प्रक्रिया में जवाबदेही और कानूनी प्रावधानों के अनुपालन के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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