भारतीय संस्कृति में हर पर्व और त्योहार की अपनी खास अहमियत है। दीपावली का जिक्र हो तो दीपों की रोशनी, रंगोली और आतिशबाजी के साथ घरौंदे की परम्परा भी जेहन में उभर आती है। कभी दीपावली से कई दिन पहले ही घरों में घरौंदा बनाने की तैयारियां शुरु हो जाती थीं। खासकर बेटियां मिट्टी, ईंट और लकड़ी से अपनी कल्पनाओं का छोटा सा आशियाना तैयार करती थीं। मगर बदलते दौर में यह खूबसूरत रवायत धीरे-धीरे ओझल होती जा रही है।

स्थानीय कस्बा खेतासराय में भी अब घरौंदा बनाने का चलन पहले की अपेक्षा काफी कम दिखाई देने लगा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के इस दौर में बच्चों का अधिकांश वक्त मोबाइल की स्क्रीन पर गुजर रहा है। नतीजतन मिट्टी से जुड़कर कुछ नया गढ़ने और अपनी रचनात्मकता को आकार देने की दिलचस्पी कम होती जा रही है। कभी घरौंदा बनाने के लिए सहेलियों के बीच पहले से मशविरा होता था कि इस बार एक मंजिला आशियाना बनेगा या दो मंजिला। अब यह उत्साह धीरे-धीरे सिमट रहा है।घरौंदा शब्द घर से बना है। दीपावली पर विशेषकर अविवाहित लड़कियों द्वारा घरौंदा बनाने की परम्परा रही है। मान्यता है कि घरौंदा बनाने और उसे सजाने से घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीराम के 14 वर्ष का वनवास पूरा कर अयोध्या लौटने पर नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका इस्तकबाल किया था। इसी खुशी और समृद्धि की कामना से घरौंदा सजाने की परम्परा प्रचलित हुई।

पहले घरौंदा बनाने के लिए मिट्टी, कपास, लकड़ी और ईंट का इस्तेमाल किया जाता था। इसके बाद रंग-बिरंगे कागज, फूलों और दीपों से उसे सजाया जाता था। घरौंदे को इस तरह संवारा जाता था, मानो वह उनका अपना आशियाना हो। कई जगह इसमें लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा रखकर पूजा-अर्चना भी की जाती थी। हालांकि अब बाजार में लकड़ी, कूट और थर्माकोल से बने रेडीमेड मंदिरों ने भी इसकी जगह ले ली है। कस्बा निवासी बरखा बताती हैं कि पहले घरौंदा बनाने को लेकर कई दिन पहले से तैयारियां शुरू हो जाती थीं। सहेलियां मिलकर तय करती थीं कि घरौंदा कैसा बनाया जाएगा। मिट्टी, कपास, लकड़ी और ईंट जुटाने से लेकर उसे सजाने तक में खासा उत्साह रहता था। अब लोगों की व्यस्तता बढ़ गई है। घर के कामकाज के बाद जो समय मिलता है, वह पढ़ाई-लिखाई में गुजर जाता है। ऐसे में घरौंदा बनाने की परम्परा पीछे छूटती जा रही है।

वहीं नेहा का कहना है कि घरौंदा बनाने के लिए सबसे जरूरी मिट्टी है, लेकिन अब आसानी से मिट्टी उपलब्ध नहीं हो पाती। कस्बे के आसपास पोखरों और अन्य स्थानों पर गंदे पानी का जमाव होने से साफ मिट्टी जुटाना मुश्किल हो गया है। इसके अलावा घरौंदे को सजाने के लिए भी कई तरह की सामग्री की जरूरत पड़ती है। खुशबू गुप्ता कहती हैं कि आज के दौर में लोग मोबाइल और इंटरनेट में ज्यादा व्यस्त हैं। फेसबुक, व्हाट्सएप और यूट्यूब पर समय बिताने के कारण पारम्परिक गतिविधियों के लिए फुर्सत कम होती जा रही है। अब लोग लकड़ी के बने मंदिर में लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा रखकर पूजा कर लेते हैं। ऐसे में घरौंदा बनाने के बारे में सोचने की फुर्सत ही नहीं मिलती।

दरअसल, घरौंदा केवल मिट्टी से बना एक छोटा सा घर नहीं, बल्कि बचपन की कल्पनाशीलता, आपसी मेल-मिलाप, पारिवारिक संस्कारों का प्रतीक रहा है। इसे बनाने में बच्चों को मेहनत, सहयोग और सृजन की सीख मिलती थी। घरौंदे में इस्तेमाल होने वाले अलग-अलग रंग जीवन में नई खुशियों और उमंग का अहसास कराते थे। मगर बाजार की रेडीमेड संस्कृति और डिजिटल दुनिया की चकाचौंध में यह परम्परा अपनी पहचान खोती जा रही है। सवाल यही है कि यदि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने की कोशिश नहीं हुई तो मिट्टी से आशियाना बनाने वाली यह खूबसूरत रवायत कहीं अतीत का किस्सा बनकर न रह जाए।
