उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर चल रही कानूनी खींचतान के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को तीन महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराने का निर्देश दिया है। साथ ही ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने की सरकारी व्यवस्था को बरकरार रखा है। इससे चुनाव संपन्न होने तक मौजूदा प्रधान प्रशासक के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे।

हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद प्रदेश में ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत के चुनाव की तैयारियों को लेकर सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी बढ़ गई है। चुनाव से संबंधित आवश्यक प्रक्रियाएं निर्धारित समयसीमा के भीतर पूरी करनी होंगी। इनमें आरक्षण निर्धारण की प्रक्रिया भी शामिल है। हालांकि, चुनाव की तारीखों और चरणवार कार्यक्रम की घोषणा राज्य निर्वाचन आयोग को करनी होगी। पंचायत चुनाव में देरी और ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किए जाने के सरकारी निर्णय को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में कुल 11 याचिकाएं दाखिल की गई थीं। इनमें छह जनहित याचिकाएं भी शामिल थीं। याचिकाकर्ताओं ने पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद निर्वाचित प्रतिनिधियों की जगह प्रशासक नियुक्त करने की व्यवस्था पर सवाल उठाए थे और समयबद्ध तरीके से चुनाव कराने की मांग की थी।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने की। बुधवार को सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुनाया। रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने चुनाव कराने की समयसीमा तय करने के साथ ही निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए रखने की व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दीं। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2021 में निर्वाचित ग्राम पंचायतों का पांच वर्षीय कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो गया था। इसके बाद राज्य सरकार ने 25 मई को जारी आदेश के तहत निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रुप में नियुक्त करने की व्यवस्था की थी। इस निर्णय के बाद पंचायत चुनाव की समय सीमा को लेकर सवाल उठने लगे थे। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि पंचायतों में लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए चुनाव समय पर कराए जाने चाहिए थे। इसी विवाद को लेकर हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गईं।

अब अदालत ने चुनाव के लिए तीन महीने की समयसीमा तय करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासक नियुक्त करने की व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिकाओं के बावजूद मौजूदा व्यवस्था फिलहाल जारी रहेगी। पंचायत चुनाव से जुड़े विवाद में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243-ई का भी हवाला दिया गया। इस अनुच्छेद के अनुसार, प्रत्येक पंचायत का कार्यकाल उसकी पहली बैठक के लिए निर्धारित तारीख से पांच वर्ष तक होता है, जब तक कि उसे कानून के अनुसार पहले भंग न कर दिया जाए।याचिकाकर्ताओं ने समय पर चुनाव कराने की संवैधानिक बाध्यता का मुद्दा उठाया था। चुनाव कार्यक्रम और मतदाता सूची तैयार करने में देरी को भी विवाद का हिस्सा बनाया गया। इससे पहले मार्च 2026 में हाईकोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग से चुनाव कार्यक्रम को अंतिम रुप देने और यह स्पष्ट करने को कहा था कि पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव प्रक्रिया पूरी हो सकेगी या नहीं। हाईकोर्ट ने निर्धारित समयसीमा में चुनाव कराने के साथ आरक्षण निर्धारण की प्रक्रिया पूरी करने का भी निर्देश दिया है। अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण से संबंधित प्रक्रिया को लेकर भी सुनवाई के दौरान चर्चा हुई।

आगामी चुनाव में सीटों का आरक्षण, मतदाता सूची, चुनाव कार्यक्रम और अन्य प्रशासनिक तैयारियां अहम रहेंगी। हालांकि, आरक्षण की अंतिम सूची और चुनाव की तारीखों के बारे में आधिकारिक अधिसूचना जारी होने के बाद ही स्पष्ट स्थिति सामने आएगी।हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को निर्धारित तीन महीने की अवधि के भीतर चुनाव की प्रक्रिया पूरी कराने की दिशा में कदम उठाने होंगे। इसमें आरक्षण निर्धारण सहित जरूरी तैयारियां शामिल हैं। चुनाव कार्यक्रम घोषित होने पर ग्राम पंचायतों के साथ क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत के चुनाव की समयसारिणी भी स्पष्ट होगी। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव को लेकर तीन महीने की समयसीमा तय की है और निवर्तमान ग्राम प्रधानों के प्रशासक के रुप में काम करने की व्यवस्था बरकरार रखी है। विस्तृत न्यायिक आदेश उपलब्ध होने के बाद निर्देशों की सटीक शब्दावली और उनके कानूनी प्रभाव की और स्पष्ट जानकारी सामने आ सकेगी।
