लोन की किस्तें बकाया होने पर फाइनेंस कंपनी को वाहन की वसूली और कब्जे का अधिकार हो सकता है, लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल मनमाने, बलपूर्वक या कानून से बाहर जाकर नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि वाहन की जब्ती और बिक्री की प्रक्रिया कानून, ऋण समझौते की शर्तों और लागू RBI दिशानिर्देशों के अनुरुप होनी चाहिए।

हरि दत्ता शर्मा बनाम स्टेट ऑफ यूपी एवं अन्य मामले में न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के 4 अप्रैल 2025 के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने फाइनेंस कंपनी को दोनों लोन खाते बंद करने, वाहन की बिक्री से प्राप्त 4.50 लाख की रकम छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ लौटाने और मानसिक पीड़ा तथा आजीविका के नुकसान के लिए 10 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया। इसके अलावा मुकदमे की लागत के रुप में 50 हजार भी निर्धारित किए गए। मामला उत्तर प्रदेश के हरि दत्ता शर्मा के Tata SFC 407 ट्रक से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, शर्मा ने 25 मार्च 2019 को चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस कंपनी लिमिटेड से व्यावसायिक वाहन के लिए ऋण लिया था। ऋण के बदले ट्रक को हाइपोथिकेट किया गया था और रकम 75 मासिक किस्तों में चुकाई जानी थी। बाद में उन्हें अतिरिक्त ऋण भी दिया गया था। ऋण भुगतान में चूक के बाद कंपनी की ओर से मांग और भुगतान संबंधी नोटिस दिए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट के सामने रखे गए तथ्यों के अनुसार, 9 अप्रैल 2023 को करीब रात एक बजे चार अज्ञात लोग वाहन के पास पहुंचे। आरोप था कि उन्होंने ट्रक का स्टीयरिंग लॉक खोला और वाहन लेकर चले गए। शर्मा ने इसे चोरी समझकर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई। बाद में उन्हें पता चला कि वाहन कंपनी ने अपने कब्जे में लिया था। रिकॉर्ड के अनुसार, कंपनी ने बाद में उक्त ट्रक को 31 अगस्त 2023 को 4.50 लाख में बेच दिया। शर्मा ने वाहन कब्जे में लेने और बिक्री की प्रक्रिया को चुनौती दी। मामला पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा, लेकिन 4 अप्रैल 2025 को उनकी याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कर्ज की रकम वसूलना फाइनेंसर का वैध अधिकार हो सकता है, लेकिन वसूली का तरीका भी कानून के अनुरुप होना चाहिए। अदालत ने RBI के फेयर प्रैक्टिस कोड और संबंधित दिशानिर्देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि वित्तीय संस्थाएं वाहन कब्जे में लेने के लिए बल या दबाव का सहारा नहीं ले सकतीं। अदालत ने ऋण समझौते की उस व्यवस्था पर भी सवाल उठाया जिसमें नोटिस दिए बिना वाहन पर कब्जा लेने और रिकवरी एजेंटों को वाहन तलाशने के लिए किसी स्थान में प्रवेश करने जैसी व्यापक शक्तियां दी गई थीं। पीठ ने माना कि ऐसी शर्तें RBI दिशानिर्देशों और निष्पक्ष प्रक्रिया की आवश्यकताओं के अनुरुप नहीं थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि अपीलकर्ता की आजीविका इसी वाहन से जुड़ी थी। अदालत के अनुसार, वाहन को मनमाने और अनुचित तरीके से कब्जे में लेने के कारण अपीलकर्ता लंबे समय तक अपनी आजीविका से वंचित रहा। पीठ ने इस कार्रवाई को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत उसके अधिकारों के उल्लंघन से जोड़ते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट का 4 अप्रैल 2025 का आदेश निरस्त किया।फाइनेंस कंपनी को दोनों लोन खाते बंद करने का निर्देश दिया। वाहन की बिक्री से मिले 4.50 लाख छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित लौटाने का आदेश।मानसिक पीड़ा और आजीविका के नुकसान के लिए 10 लाख मुआवजा। मुकदमे की लागत के रुप में 50 हजार। RBI को बैंकों और NBFCs द्वारा उसके रिकवरी संबंधी दिशानिर्देशों के वास्तविक अनुपालन के लिए प्रभावी कदम उठाने का निर्देश दिया। अदालत ने टिप्पणी की कि RBI की ओर से जारी दिशानिर्देश और मास्टर सर्कुलर मौजूद होने के बावजूद उनका प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित किया जाना जरुरी है। सुप्रीम कोर्ट ने RBI को बैंकों और NBFCs द्वारा इन दिशानिर्देशों का वास्तविक पालन सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठाने को कहा है।
