करीब 11 साल पुराने चरस बरामदगी के मामले में मुजफ्फरनगर की विशेष एनडीपीएस अदालत ने अशोक भारती को दोषमुक्त कर दिया। विशेष न्यायाधीश एनडीपीएस एक्ट/अपर सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक) रवि कुमार दिवाकर ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को तर्कपूर्ण संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा।
अभियोजन के अनुसार, 21 अक्टूबर 2015 को थाना नई मंडी क्षेत्र में एसआई बचन सिंह पुलिसकर्मियों के साथ गश्त पर थे। बालाजी धाम मंदिर के पास पुलिस को देखकर एक व्यक्ति भरतिया कॉलोनी की ओर जाने लगा। पुलिस ने पीछा कर उसे पकड़ा। पूछताछ में उसकी पहचान पटेलनगर निवासी अशोक भारती के रुप में हुई। पुलिस ने उसके कुर्ते की दाहिनी जेब से पॉलीथिन में करीब 150 ग्राम चरस बरामद होने का दावा किया था। बरामद पदार्थ में से 20 ग्राम नमूने के रुप में अलग किया गया था। मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन की ओर से एसआई बचन सिंह, सीसी सुनील कुमार, विवेचक एसआई सुनील कुमार और कांस्टेबल लालजी की गवाही कराई गई। अदालत ने पुलिस के साक्ष्यों में कई विसंगतियां पाईं। मौके पर सार्वजनिक लोगों की मौजूदगी के बावजूद किसी स्वतंत्र व्यक्ति को गवाह नहीं बनाया गया था। इसके अलावा बरामदगी के वजन को लेकर पुलिसकर्मी के बयान और बरामदगी फर्द में भी अंतर सामने आया।

अदालत ने तलाशी के दौरान एनडीपीएस एक्ट की धारा 50 से जुड़े अनुपालन पर भी सवाल उठाए। रिपोर्टों के अनुसार, सहमति पत्र पर अभियुक्त के हस्ताक्षर थे, लेकिन पत्र अभियुक्त ने स्वयं नहीं लिखा था और उस पर लेखक के हस्ताक्षर भी नहीं थे। अदालत के समक्ष नमूने की सील से संबंधित पहलू भी अभियोजन के लिए संतोषजनक रुप से स्थापित नहीं हो सके। फैसले में न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने मुकदमे के लंबे समय तक चलने पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को निर्दोष साबित होने में लगभग 10 साल लगना दुर्भाग्यपूर्ण है और इतने लंबे समय तक अदालतों के चक्कर लगाना भी अपने आप में एक दंड है।
न्यायाधीश ने इस संदर्भ में फिल्म ‘दामिनी’ के चर्चित ‘तारीख पर तारीख’ संवाद का उल्लेख किया। उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया में होने वाली देरी के प्रभाव की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि लंबे समय तक चलने वाली कानूनी प्रक्रिया व्यक्ति पर गंभीर मानसिक दबाव डाल सकती है। इसी फैसले में जज रवि कुमार दिवाकर ने अपनी अदालत से हत्या के 97 मुकदमों की पत्रावलियां वापस लिए जाने के आदेश पर भी सवाल उठाया। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने ‘पार्ट हर्ड’ यानी जिन मामलों में सुनवाई शुरु हो चुकी थी, ऐसी पत्रावलियों को वापस लेने की वैधानिक प्रक्रिया और आदेश में कारणों के अभाव का उल्लेख किया।उन्होंने न्यायिक एवं प्रशासनिक शक्तियों के बीच निर्धारित सीमाओं का भी उल्लेख किया और सवाल उठाया कि यदि किसी न्यायाधीश के साथ अन्याय हो तो वह कहां जाए। इस हिस्से में उन्होंने संबंधित कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए अपने न्यायालय से मुकदमों की पत्रावलियां वापस लिए जाने पर आपत्ति दर्ज की।
