अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत पीड़ितों को दी जाने वाली आर्थिक राहत राशि के संभावित दुरुपयोग को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने उत्तर प्रदेश में ऐसे मामलों की प्रभावी निगरानी और जांच के निर्देश दिए हैं, ताकि सरकारी राहत वास्तविक पात्र पीड़ितों तक पहुंचे।

इसी क्रम में गाजियाबाद में पिछले करीब डेढ़ वर्ष के दौरान एससी-एसटी एक्ट से जुड़े 15 से अधिक मामलों में जांच के बाद राहत राशि के दावों में अनियमितता सामने आने की बात कही गई है। इन मामलों में दी गई करीब 8.90 लाख रुपये की सहायता राशि की रिकवरी की गई है। अधिकारियों के अनुसार, कुछ मामलों में गलत तथ्यों या शिकायतों के आधार पर राहत प्राप्त किए जाने की जांच हुई है।रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल 2025 से अब तक गाजियाबाद में समाज कल्याण विभाग ने एससी-एसटी एक्ट से संबंधित 186 मामलों में दो करोड़ रुपये से अधिक की सहायता राशि वितरित की है। हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद ऐसे दावों के सत्यापन की प्रक्रिया को और सख्त किया गया है।
हाईकोर्ट के समक्ष झांसी से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान एक ही परिवार के सदस्यों को विभिन्न मामलों में बड़ी मात्रा में राहत राशि मिलने का तथ्य सामने आया था। अदालत ने इसे जांच योग्य मानते हुए संबंधित मामलों और प्राप्त राहत राशि की निष्पक्ष जांच के निर्देश दिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि बार-बार मामले दर्ज होना अपने आप में दुरुपयोग साबित नहीं करता, लेकिन ऐसे पैटर्न की जांच जरुरी है। अदालत ने प्रदेश में एससी-एसटी एक्ट और संबंधित नियमों के तहत बार-बार राहत का दावा करने वाले मामलों की व्यापक जांच तथा प्रभावी निगरानी व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया है। साथ ही यह स्पष्ट किया गया है कि जांच का उद्देश्य वास्तविक पीड़ितों के वैध दावों को प्रभावित करना नहीं होना चाहिए।गाजियाबाद में भी अब राहत राशि जारी करने से पहले दावों के सत्यापन पर विशेष जोर दिया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार, अनुचित तरीके से राहत लेने के मामलों में रिकवरी के साथ विधिक कार्रवाई भी की जा रही है।
