आईएएस छोड़ने की वजह तो दिव्य है, लेकिन चुनौती बेहिसाब! जीवन को महज नौकरी का ढर्रा मान लेने वाले अफसरों से अलग दिव्या मित्तल ने चुना कठिन रास्ता

अरुणा रॉय ने कुर्सी छोड़ी तो जनता के बीच पहुंचीं, ओपी चौधरी ने चुनावी राजनीति का रास्ता चुना और अभिषेक सिंह मनोरंजन की द

Akhlaque Khan
Akhlaque Khan Published on : September 29, 2026 5:24 pm
आईएएस छोड़ने की वजह तो दिव्य है, लेकिन चुनौती बेहिसाब! जीवन को महज नौकरी का ढर्रा मान लेने वाले अफसरों से अलग दिव्या मित्तल ने चुना कठिन रास्ता
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जहां पूरे सेवाकाल में प्रतिष्ठा, अधिकार और सुविधाओं के साथ काम करने का अवसर मिलता हो, वहां किसी आईएएस अधिकारी का अपनी कुर्सी छोड़ना आसान फैसला नहीं होता। प्रशासनिक सेवा केवल एक नौकरी नहीं होती। उसके साथ अधिकार, प्रभाव, सरकारी मशीनरी और समाज में एक विशेष सम्मान जुड़ा होता है। ऐसे में दिव्या मित्तल का आईएएस सेवा से अलग होकर राजनीति की राह चुनना निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण फैसला है।

खास बात यह है कि उनके इस्तीफे के साथ भ्रष्टाचार या किसी गंभीर विभागीय कार्रवाई का कोई स्थापित आरोप नहीं जुड़ा है। उन्होंने स्वयं सरकारी व्यवस्था की कमियों पर सवाल उठाए और अब उसी व्यवस्था में बदलाव के लिए राजनीति को माध्यम बनाने का निर्णय लिया है। इसलिए उनका फैसला महज नौकरी छोड़ने की घटना नहीं है। असली कहानी अब शुरू होती है। भारतीय प्रशासनिक सेवा से अलग-अलग कारणों से बाहर निकले अधिकारियों की कहानियां भी अलग रही हैं। अरुणा रॉय इसका उल्लेखनीय उदाहरण हैं। 1968 बैच की आईएएस अधिकारी अरुणा रॉय ने 1974 में सेवा छोड़ने के बाद राजस्थान में ग्रामीण मजदूरों और किसानों के बीच काम किया। आगे चलकर मजदूरी, राशन, सामाजिक अंकेक्षण और सूचना के अधिकार जैसे मुद्दों पर उनका आंदोलन व्यापक हुआ। उन्होंने सत्ता हासिल करने के बजाय जनता को सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार दिलाने का रास्ता चुना।

ओपी चौधरी ने 2018 में आईएएस सेवा से इस्तीफा देकर सीधे सक्रिय राजनीति का रास्ता अपनाया और भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। उनका तर्क था कि प्रशासनिक व्यवस्था की अपनी सीमाएं हैं और वे जनता के लिए अधिक व्यापक स्तर पर काम करना चाहते हैं। यानी उनका रास्ता स्पष्ट था—नौकरशाही से निकलकर चुनावी राजनीति में प्रवेश। कुछ अन्य अधिकारियों के रास्ते भी अलग रहे। ओम पाठक ने सेवा से इस्तीफा देने के वर्षों बाद चुनावी राजनीति में प्रवेश किया। वहीं अभिषेक सिंह की कहानी अलग रही। निलंबन के दौर के बाद उन्होंने इस्तीफा दिया और मनोरंजन की दुनिया में सक्रिय हो गए। इससे यह स्पष्ट होता है कि हर आईएएस अधिकारी का इस्तीफा किसी व्यवस्था परिवर्तन के आंदोलन का संकेत नहीं होता। दिव्या मित्तल का मामला इन उदाहरणों से अलग दिखाई देता है। उन्होंने प्रशासनिक सेवा में रहते हुए व्यवस्था की कमियों को करीब से देखा और अब उन कमियों को बदलने के लिए राजनीति में उतरने का निर्णय लिया है। मिर्जापुर के लहुरियादह स्थित स्कूल का उदाहरण देते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि स्वीकृति और धन उपलब्ध होने के बावजूद वर्षों तक निर्माण क्यों नहीं हो सका। उनके अनुसार समस्या केवल नियमों या संसाधनों की नहीं, बल्कि नीयत और कार्यप्रणाली की भी है। यदि सरकारी व्यवस्था की कमियां उन्हें प्रशासन में रहते हुए स्पष्ट दिखाई दे रही थीं, तो उन्हें यह निर्णय लेने में तेरह वर्ष क्यों लगे कि व्यवस्था को बदलने के लिए राजनीति का रास्ता अपनाना जरुरी है? यह कोई आरोप नहीं, बल्कि उनके निर्णय से स्वाभाविक रुप से पैदा होने वाला सवाल है। उन्होंने प्रशासन के भीतर रहते हुए किन स्तरों पर बदलाव की कोशिश की? किन परिस्थितियों में उन्हें लगा कि व्यवस्था के भीतर रहकर परिवर्तन की सीमाएं समाप्त हो गई हैं? जनता निश्चित रूप से इन सवालों के जवाब जानना चाहेगी।

जिस सरकारी ढांचे को उन्होंने भीतर से देखा है, उसी ढांचे के साथ राजनीति में रहते हुए उन्हें काम करना होगा। जिलाधिकारी के पास प्रशासनिक अधिकार, सरकारी मशीनरी और निर्णय लागू कराने की संस्थागत शक्ति होती है। एक राजनेता के पास ऐसी शक्ति स्वतः नहीं होती। उसके लिए संगठन, जनसमर्थन, राजनीतिक कार्यकर्ता और निरंतर सार्वजनिक संवाद जरूरी होता है। दिव्या मित्तल यदि किसी राजनीतिक दल में शामिल हुए बिना स्वतंत्र राजनीतिक मंच बनाने की दिशा में आगे बढ़ती हैं, तो चुनौती और बड़ी होगी। संगठन कैसे खड़ा होगा? आर्थिक संसाधन कहां से आएंगे? चुनावी राजनीति के स्थानीय और सामाजिक समीकरणों से कैसे निपटा जाएगा? जनता को अपने साथ जोड़ने के लिए केवल प्रशासनिक अनुभव पर्याप्त होगा या एक मजबूत राजनीतिक संगठन भी बनाना पड़ेगा? परिवार और निजी जीवन की जिम्मेदारियां भी उनके सामने हैं। बच्चों की स्वास्थ्य संबंधी जरुरतें, पति की नौकरी और अपना सार्वजनिक जीवन, इन सबके बीच राजनीति के लिए पर्याप्त समय और ऊर्जा निकालना आसान नहीं होगा। प्रशासनिक सेवा से बाहर निकलने के पीछे यदि पारिवारिक कारण भी रहे हैं, तो राजनीति निश्चित रुप से उनसे कम चुनौतीपूर्ण रास्ता नहीं है। बल्कि चुनावी राजनीति कहीं अधिक अनिश्चित और लगातार सार्वजनिक दबाव वाली दुनिया है। दिव्या मित्तल की सबसे बड़ी पूंजी फिलहाल उनका प्रशासनिक अनुभव और सार्वजनिक जीवन में बनी उनकी छवि है। लेकिन यही अनुभव उनकी सबसे बड़ी परीक्षा भी बनने वाला है। उन्होंने व्यवस्था को भीतर से देखा है, इसलिए जनता उनसे केवल भाषण नहीं, बल्कि समाधान का व्यावहारिक रास्ता पूछेगी। अरुणा रॉय ने सत्ता से सवाल पूछने और जनता को अधिकारों के प्रति जागरूक करने का रास्ता चुना। ओपी चौधरी ने राजनीतिक दल और चुनावी राजनीति का रास्ता अपनाया। दिव्या मित्तल ने इन दोनों से अलग रास्ता चुना है। अब असली परीक्षा यही है कि आईएएस की कुर्सी छोड़कर राजनीति में आई दिव्या मित्तल वह राजनीतिक ताकत और जनसंगठन कैसे खड़ा करती हैं, जिसके सहारे वे उस व्यवस्था में बदलाव ला सकें, जिसे उन्होंने प्रशासनिक सेवा के दौरान बेहद करीब से देखा है। कुर्सी छोड़ना बड़ा फैसला था। लेकिन व्यवस्था बदलने की लड़ाई उससे कहीं बड़ी है।

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